जोधपुर (राजीव गौड़) : जोधपुर की धरती पर दशहरे की कहानी सिर्फ भगवान श्रीराम की विजय और रावण दहन तक सीमित नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और अनूठी सांस्कृतिक विरासत का संगम है. मान्यताओं के मुताबिक, सूर्यनगरी का नाता भगवान श्रीराम की वनवासकालीन कथाओं से भी जुड़ता है, तो मंडोर को रावण की ससुराल के रूप में पहचान मिलती है. यहां श्रीराम के मंदिरों में श्रद्धा झलकती है, वहीं रावण की चवंरी से जुड़ी परंपराएं इतिहास की एक अलग तस्वीर पेश करती हैं. देशभर में रावण दहन के बीच जोधपुर में एक समुदाय शोक भी मनाता है, लेकिन भगवान श्रीराम के प्रति अपनी आस्था कायम रखता है. यही अनूठा संगम जोधपुर के दशहरे को विशिष्ट बनाता है, जहां आस्था के रंग भी हैं और सदियों पुरानी लोकमान्यताओं की गूंज भी.
जोधपुर में प्रचलित मान्यताओं और धार्मिक ग्रंथों के उल्लेखों के मुताबिक, भगवान श्रीराम के वनवास काल के दौरान सूर्यनगरी से जुड़ी कई कथाएं सामने आती हैं. मान्यता है कि पिता दशरथ के निधन के बाद भगवान श्रीराम ने जोधपुर के निकट चोखा गांव स्थित भद्रेश्वर महादेव मंदिर में बाल भद्र की परंपरा निभाई और पूजा-अर्चना की. वहीं चांदपोल क्षेत्र स्थित रामेश्वरम मंदिर के शिवलिंग को हनुमानजी द्वारा स्थापित किए जाने और भगवान श्रीराम द्वारा उसका जलाभिषेक किए जाने की कथा भी स्थानीय धार्मिक परंपराओं में प्रचलित है. इन मान्यताओं के साथ जोधपुर का धार्मिक महत्व और गहरा हो जाता है.
सूर्यवंश में भगवान श्रीराम के जन्म और सूर्यनगरी नाम से जुड़ी सांस्कृतिक पहचान को भी स्थानीय लोग अपने गौरव से जोड़कर देखते हैं. स्कंद पुराण सहित विभिन्न पुस्तकों और पुरानी बहियों में इन परंपराओं से जुड़े उल्लेख होने की बात कही जाती है, हालांकि इनकी ऐतिहासिक पुष्टि के लिए संबंधित मूल स्रोतों का अध्ययन आवश्यक है. दूसरी ओर, मंडोर में स्थित रावण की चबरी जोधपुर के इतिहास और लोकमान्यताओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है. स्थानीय मान्यता के अनुसार, रावण का विवाह मंडोर की राजकुमारी मंदोदरी से हुआ था और इसी कारण मंडोर को रावण की ससुराल के रूप में भी पहचाना जाता है.
दशहरे पर जहां पूरा देश रावण दहन के साथ विजयादशमी का उत्सव मनाता है, वहीं रावण से अपना वंशज संबंध मानने वाला एक समुदाय इस दिन शोक भी मनाता है. इस परंपरा की खासियत यह है कि रावण दहन पर शोक व्यक्त करने के बावजूद भगवान श्रीराम के प्रति श्रद्धा और उनकी पूजा की परंपरा भी निभाई जाती है. यही विरोधाभास नहीं, बल्कि जोधपुर की सांस्कृतिक विविधता का अनूठा स्वरूप है. भगवान श्रीराम से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं हों या रावण की ससुराल होने की लोकपरंपरा, दशहरे पर ये दोनों धाराएं सूर्यनगरी के गौरव को और खास बना देती हैं.