VIDEO: शूटिंग जगत ने खोया अपना एक चमकता सितारा, एशियाड और कॉमनवेल्थ खेलों के कई पदक विजेता थे जसपाल राणा, देखिए ये खास रिपोर्ट

जयपुर : भारतीय निशानेबाजी को विश्व पटल पर नई पहचान दिलाने वाले दिग्गज शूटर और कोच जसपाल अब हमारे बीच नहीं रहे. 49 वर्ष की उम्र में उनका निधन भारतीय खेल जगत के लिए अपूरणीय क्षति है. एक ऐसे खिलाड़ी, जिसने अपने निशाने से भारत को गौरवान्वित किया और बाद में अपनी कोचिंग से नई पीढ़ी के चैंपियन तैयार किए. 

कुछ लोग सिर्फ पदक नहीं जीतते, वे एक खेल की पहचान बन जाते हैं. भारतीय निशानेबाजी में जसपाल राणा ऐसा ही एक नाम था. आज उनका जाना सिर्फ एक खिलाड़ी का निधन नहीं, बल्कि भारतीय खेलों के एक सुनहरे अध्याय का विराम है. लक्ष्य पर अचूक निशाना, हाथों में पिस्टल और आंखों में देश के लिए कुछ बड़ा कर दिखाने का सपना. यही पहचान थी भारतीय शूटिंग के महानायक जसपाल राणा की. उत्तराखंड के उत्तरकाशी से निकलकर उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का परचम लहराया. एक युवा लड़का, जिसकी आंखों में सपना था भारत का तिरंगा दुनिया के सबसे बड़े मंचों पर लहराने का. वह लड़का बड़ा हुआ और जसपाल राणा बन गया-एक ऐसा नाम जिसने निशानेबाजी को भारत के घर-घर तक पहुंचाया. जब भारत में शूटिंग को बहुत कम लोग जानते थे, तब जसपाल राणा ने अपने निशाने से दुनिया को भारत का नाम याद कराया. हर मेडल के पीछे वर्षों की मेहनत थी, हर जीत के पीछे देश के लिए कुछ कर गुजरने का जुनून.  

1994 में जूनियर विश्व चैंपियनशिप में विश्व रिकॉर्ड के साथ दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा और फिर सफलता की नई इबारत लिखते चले गए. कॉमनवेल्थ खेलों में जसपाल राणा भारत के सबसे सफल खिलाड़ियों में गिने जाते हैं. उन्होंने चार कॉमनवेल्थ गेम्स में कुल 15 पदक जीते, जिनमें 9 स्वर्ण, 4 रजत और 2 कांस्य पदक शामिल हैं. 2002 मैनचेस्टर कॉमनवेल्थ गेम्स उनका सबसे सफल अभियान रहा. एशियाई खेलों में भी जसपाल राणा का दबदबा कायम रहा. 2006 दोहा एशियाड में उन्होंने तीन स्वर्ण और एक रजत पदक जीतकर इतिहास रचा. 25 मीटर सेंटर फायर पिस्टल स्पर्धा में उन्होंने विश्व रिकॉर्ड की बराबरी करते हुए भारत को गौरवान्वित किया.

खिलाड़ी के रूप में शानदार उपलब्धियों के बाद जसपाल राणा ने कोच की भूमिका में भी भारतीय शूटिंग को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया. उन्होंने कई युवा निशानेबाजों को तराशा, जिनमें सबसे चर्चित नाम है मनु भाकर. पेरिस ओलंपिक में मनु भाकर की ऐतिहासिक सफलता के पीछे जसपाल राणा की कोचिंग और मार्गदर्शन को अहम माना गया. उनके योगदान को देश ने समय-समय पर सम्मानित भी किया. मात्र 18 वर्ष की उम्र में उन्हें अर्जुन पुरस्कार मिला, बाद में पद्मश्री से सम्मानित किया गया और कोचिंग में उत्कृष्ट योगदान के लिए द्रोणाचार्य पुरस्कार भी मिला.

आज बंदूक शांत है. निशाना खामोश है. लेकिन उन गोलियों की गूंज अब भी भारतीय खेल इतिहास के पन्नों में सुनाई देती है. आज जसपाल राणा हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन हर उस भारतीय निशानेबाज में उनका अक्स दिखाई देगा, जो देश के लिए पदक जीतने का सपना देखता है. कुछ लोग दुनिया से चले जाते हैं, लेकिन इतिहास से कभी नहीं जाते. जसपाल राणा भी उन्हीं नामों में शामिल हो गए हैं. उनके हाथों का निशाना थम गया है, लेकिन उनकी विरासत आने वाले वर्षों तक भारतीय निशानेबाजी को राह दिखाती रहेगी.