जयपुरः राजस्थान यूनिवर्सिटी में पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है. आरोप है कि विश्वविद्यालय के कई विभागों में आरक्षित वर्ग की सीटें खाली रहने के बावजूद उन्हें सामान्य वर्ग के प्रतीक्षारत अभ्यर्थियों से नहीं भरा जा रहा है. छात्रों का कहना है कि इससे न केवल प्रतिभाशाली अभ्यर्थी प्रवेश से वंचित हो रहे हैं, बल्कि विश्वविद्यालय को भी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है. छात्रों ने सुप्रीम कोर्ट, दिल्ली हाईकोर्ट, कॉलेज शिक्षा आयुक्तालय और महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय अजमेर के उदाहरण देते हुए राजस्थान यूनिवर्सिटी की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं.
पीएचडी प्रवेश पर उठे सवाल
राजस्थान यूनिवर्सिटी के कई विभागों में पीएचडी की सीटें खाली
पीएचडी की सीटे खाली रहने पर सामान्य वर्ग के अभ्यर्थी प्रतीक्षा में
प्रवेश नहीं मिलने से छात्रों में नाराजगी
क्या कहते हैं नियम?
आरक्षित वर्ग का अभ्यर्थी उपलब्ध नहीं होने पर सीटें खाली न छोड़ी जाएं
रिक्त सीटों को सामान्य वर्ग से भरने का प्रावधान
सुप्रीम कोर्ट का हवाला-सिविल अपील संख्या 7084/2011 का उल्लेख-खाली सीटों को भरने पर जोर
दिल्ली हाईकोर्ट की टिप्पणी-5 नवंबर 2019 के आदेश का हवाला-खाली सीटों को "शिक्षा की बर्बादी" बताया गया
कॉलेज शिक्षा आयुक्तालय की प्रवेश नीति 2026-27 बिंदु 6.1.10 का उल्लेख
रिक्त सीटों को प्रतीक्षारत सामान्य वर्ग से भरने का प्रावधान
एमडीएस यूनिवर्सिटी अजमेर बना उदाहरण-हालिया पीएचडी प्रवेश में रिक्त सीटें भरी गईं
छात्रों ने राजस्थान यूनिवर्सिटी से भी वही मॉडल अपनाने की मांग की
राजस्थान यूनिवर्सिटी की पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया एक बार फिर सवालों के घेरे में है. विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों में आरक्षित वर्ग की कई सीटें रिक्त रहने के बावजूद उन्हें सामान्य वर्ग के पात्र और प्रतीक्षारत अभ्यर्थियों से नहीं भरे जाने का आरोप लगाया जा रहा है. इससे प्रवेश की उम्मीद लगाए बैठे अनेक छात्र-छात्राओं को लगातार विश्वविद्यालय के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं.छात्रों का कहना है कि जब कई विभागों में सीटें खाली हैं और सामान्य वर्ग के योग्य अभ्यर्थी उपलब्ध हैं, तब भी प्रवेश नहीं देना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है. उनका आरोप है कि विश्वविद्यालय प्रशासन और पीएचडी प्रवेश से जुड़े जिम्मेदार अधिकारी इस मामले में अनावश्यक देरी और आनाकानी कर रहे हैं.मामले को और गंभीर इसलिए माना जा रहा है क्योंकि छात्रों ने अपने पक्ष में कई उदाहरण और नियमों का हवाला दिया है. सबसे पहले महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय, अजमेर का उदाहरण दिया जा रहा है, जहां हाल में संपन्न पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया में आरक्षित वर्ग की रिक्त रह गई सीटों को सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों से भरने की कार्रवाई की गई.इसके अलावा छात्रों द्वारा सुप्रीम कोर्ट की सिविल अपील संख्या 7084/2011 का भी उल्लेख किया जा रहा है. उनका दावा है कि इस निर्णय में यह कहा गया कि यदि आरक्षित वर्ग का कोई पात्र अभ्यर्थी उपलब्ध नहीं है तो संबंधित सीट को खाली छोड़ने के बजाय अन्य पात्र अभ्यर्थियों से भरा जा सकता है.यही नहीं, दिल्ली हाईकोर्ट के 5 नवंबर 2019 के एक आदेश का हवाला देते हुए भी छात्रों का कहना है कि अदालत ने शिक्षा संस्थानों में सीटों के खाली रह जाने को शिक्षा संसाधनों की बर्बादी माना था. छात्रों का तर्क है कि जब देश की अदालतें और अन्य विश्वविद्यालय सीटों के अधिकतम उपयोग की वकालत कर रहे हैं, तब राजस्थान यूनिवर्सिटी का रवैया समझ से परे है.
कॉलेज शिक्षा आयुक्तालय की प्रवेश नीति 2026-27 का भी इस विवाद में उल्लेख हो रहा है. नीति के बिंदु 6.1.10 के अनुसार यदि किसी आरक्षित वर्ग की सीट रिक्त रह जाती है तो उसे सामान्य वर्ग के प्रतीक्षारत अभ्यर्थियों से भरा जा सकता है. छात्रों का कहना है कि जब नीति में स्पष्ट प्रावधान मौजूद है तो उसका पालन क्यों नहीं किया जा रहा.इस पूरे मामले का दूसरा पहलू विश्वविद्यालय को होने वाला आर्थिक नुकसान भी है. पीएचडी सीटें खाली रहने से विश्वविद्यालय को मिलने वाला शुल्क और शैक्षणिक संसाधनों का उपयोग दोनों प्रभावित होते हैं. वहीं दूसरी ओर योग्य अभ्यर्थियों का एक शैक्षणिक वर्ष भी दांव पर लग जाता है.अब छात्र मांग कर रहे हैं कि राजस्थान यूनिवर्सिटी प्रशासन तत्काल रिक्त सीटों की समीक्षा करे और नियमों तथा न्यायालयों की भावना के अनुरूप प्रवेश प्रक्रिया को पूरा करते हुए खाली पड़ी सीटों को भरने का निर्णय ले. फिलहाल सभी की निगाहें विश्वविद्यालय प्रशासन के अगले कदम पर टिकी हैं.
एक तरफ अदालतों के आदेश, सरकारी प्रवेश नीति और दूसरे विश्वविद्यालयों के उदाहरण हैं, तो दूसरी तरफ राजस्थान यूनिवर्सिटी में खाली पड़ी पीएचडी सीटें. बड़ा सवाल यही है कि जब सीटें हैं, पात्र अभ्यर्थी हैं और नियमों में रास्ता भी मौजूद है, तो फिर इन सीटों को भरने में आखिर देरी क्यों? इसी सवाल का जवाब अब छात्र भी चाहते हैं.