VIDEO: 500 करोड़ की जमीन मामले में नए खुलासों से बढ़ा विवाद, ग्रीन फायर भूमि प्रकरण में अब और बड़े सवाल, देखिए ये खास रिपोर्ट

जयपुर: राजधानी जयपुर के जवाहरलाल नेहरू मार्ग पर ग्रीन फायर हॉस्पिटल से जुड़े बेशकीमती भूमि के मामले में नित नए खुलासे हो रहे हैं.मामले में निलंबित तत्कालीन जोन उपायुक्त बलवंत सिंह लिग्री के अलावा और भी जिम्मेदार पदों पर बैठे तत्कालीन लोगों की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं.क्या है पूरा मामला जानने के लिए देखें फर्स्ट इंडिया न्यूज़ की इस पूरे मामले में एक और एक्सक्लूसिव खबर. 

जवाहरलाल नेहरू मार्ग पर वर्ल्ड ट्रेड पार्क के सामने करीब 500 करोड रुपए बाजार भाव की इस भूमि को ग्रीन फायर हॉस्पिटल और रत्न प्रभा वे अन्य को आवंटित करने का राष्ट्रीय लोक अदालत ने फैसला किया था इस फैसले को लागू करने को लेकर हाईकोर्ट में अब मानना याचिका लंबित है जेडीए स्तर पर मामले की की गई पड़ताल में तत्कालीन जॉन उपयुक्त बलवंत सिंह डिग्री की भूमिका संदिग्ध मानी गई इसके बाद राज्य सरकार की ओर से लेकर को निलंबित भी कर दिया गया है.उधर पूरे मामले को लेकर जेडीए की ओर से राज्य सरकार को भेजे गए एक पत्र में और भी कई खुलासे किए गए हैं.

-जेडीए की ओर से भेजे गए पत्र में बताया गया है कि 
-यह प्रकरण 10 अक्टूबर 2022 को हाई कोर्ट के मध्यस्थता केंद्र में भेजा गया था 
-मामले में प्रभावी पैरवी के लिए जोन उपायुक्त की ओर से तत्कालीन अतिरिक्त महाधिवक्ता अनिल मेहता को दी गई थी जिम्मेदारी 
-जेडीए की ओर से डीड आफ सेटेलमेंट प्रस्तुत करने के लिए अतिरिक्त अधिवक्ता अनिल मेहता को लिखा गया 
-अतिरिक्त महाधिवक्ता को 25 अगस्त 2023 को लिखे गए पत्र में तत्कालीन जोन उपायुक्त बलवंत सिंह लिग्री ने बताया कि  
- "डीड आफ सेटेलमेंट का अनुमोदन आयुक्त महोदय से कराए जाने के बाद हस्ताक्षर कर डीड आफ सेटेलमेंट आपको भिजवाई जा रही है"
-"इस डीड ऑफ सेटलमेंट को  मध्यस्थता केंद्र में प्रस्तुत कर नियमानुसार कार्रवाई करने का श्रम करें" 
-विधि के जानकारों का यह कहना है कि 
-अतिरिक्त महाधिवक्ता की नियुक्ति अदालत में राज्य सरकार व संबंधित सरकारी संस्था के हितों की रक्षा के लिए की जाती है 
-इन विशेषज्ञों का यह कहना है कि तत्कालीन अतिरिक्त महाधिवक्ता को यह देखना चाहिए था कि  
-इतनी बड़ी मौके की जमीन के महत्वपूर्ण मामले में राज्य सरकार से स्वीकृति ली गई है या नहीं?
-लेकिन इसको देखे बिना ही तत्कालीन अतिरिक्त महाधिवक्ता ने डीड आफ सेटेलमेंट प्रस्तुत कर दी 
-इसी सेटलमेंट के आधार पर राष्ट्रीय लोक अदालत ने ग्रीन फायर हॉस्पिटल को 17433 वर्ग गज भूमि और रत्न प्रभा वे अन्य को 6200 वर्ग गज भूमि देने का फैसला कर दिया 
-जेडीए की ओर से सरकार को भेजे इस पत्र में यह भी कहा गया है कि 
-पत्रावली पर कहीं भी जेडीए आयुक्त के अनुमोदन बाबत कोई भी तथ्य या कार्यालय आदेशिका उपलब्ध नहीं है
-समझौते पर तो तत्कालीन जोन  उपायुक्त बलवंत सिंह डिग्री ने हस्ताक्षर किए थे
-लेकिन यह हस्ताक्षरित समझौता मध्यस्थता केंद्र में तत्कालीन जोन  उपायुक्त कनिष्क सैनी की ओर से  पेश किया गया
-जेडीए की ओर से सरकार को भेजे इस पत्र में कहा गया है कि 
-"आवश्यक प्रशासनिक स्वीकृति प्राप्त किए बिना ही स्वयं के स्तर से निर्णय लेते हुए तत्कालीन जॉनी आयुक्त बलवंत सिंह लिग्री जो कि अंडर ट्रांसफर थे" 
-"उनके द्वारा समझौता हस्ताक्षर किया गया और 
-उनके बाद आए तत्कालीन जोन  उपयुक्त कनिष्क सैनी ने इस समझौते को मध्यस्थता केंद्र के समक्ष प्रस्तुत किया.
-और अपने वैधानिक अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण करते हुए तथा राज्य सरकार की स्वीकृति की अभाव में एक निजी संस्थान को अनुचित लाभ पहुंचाना प्रतीत होता है" 
-"जो कि प्रथम दृश्टया  अधिकारियों के दुरुपयोग व  गंभीर प्रशासनिक लापरवाही किया जाना प्रतीत होता है"

इस प्रकरण में हाई कोर्ट में अगली सुनवाई 20 जुलाई को होगी.तब ही पता चलेगा कि में राज्य सरकार की स्वीकृति नहीं लेने के जेडीए के तर्क को हाई कोर्ट गंभीरता से लेता है या फिर राष्ट्रीय लोक अदालत के फैसले की पालना करने के आदेश देता है.